क्या हम केवल 'मशीनें' तैयार कर रहे हैं या 'ज़िम्मेदार नागरिक'? यह एक ऐसा सवाल है, जिस पर आज हर भारतीय को विचार करने की आवश्यकता है।
आज की शिक्षा प्रणाली में गणित, विज्ञान और भाषा जैसे विषयों को 100 अंकों की प्रधानता दी जाती है, क्योंकि वे हमें जीवन यापन के साधन (कौशल और करियर) प्रदान करते हैं। लेकिन विडंबना देखिए कि 'नागरिक शास्त्र', जो हमें समाज में रहना और देश को चलाना सिखाता है, उसे मात्र 25 अंकों के कोने में धकेल दिया गया है।
अंकों का गणित और राष्ट्र का भविष्यजब कोई विषय केवल 25 अंकों का होता है, तो विद्यार्थी उसे 'अनिवार्य बोझ' समझकर केवल रटता है, आत्मसात नहीं करता। परिणाम स्वरूप:
हम गणित में गणना करना तो सीख जाते हैं, लेकिन समाज में अपने योगदान का हिसाब भूल जाते हैं।
हम विज्ञान से तकनीक तो समझ लेते हैं, लेकिन लोकतंत्र की कार्यप्रणाली से अनजान रह जाते हैं।
हम भाषा में निपुण हो जाते हैं, लेकिन अपने अधिकारों और कर्तव्यों के बीच संवाद करना भूल जाते हैं।
अधिकारों की भूख बनाम कर्तव्यों के प्रति उदासीनता
यदि हम भावी पीढ़ी को यह नहीं सिखाएंगे कि एक स्वस्थ लोकतंत्र कैसे काम करता है, तो हम एक ऐसा समाज बनाएंगे जो अपने 'अधिकारों' के लिए तो सड़कों पर उतरेगा, लेकिन अपने 'कर्तव्यों' के समय आँखें फेर लेगा। जिस देश में नागरिक शास्त्र को कम महत्व दिया जाता है, वहाँ भ्रष्टाचार, अनुशासनहीनता और सार्वजनिक संपत्तियों के प्रति लापरवाही का पनपना स्वाभाविक है।
समय की पुकार
हमें समझना होगा कि नागरिक शास्त्र केवल एक किताबी विषय नहीं, बल्कि देश की नैतिक रीढ़ है। यह हमें सिखाता है कि मतदान क्यों ज़रूरी है, कानून का सम्मान क्यों करना चाहिए और विविधता में एकता का वास्तविक अर्थ क्या है।
निष्कर्ष: यदि हमें एक सशक्त और महान भारत का निर्माण करना है, तो हमें 'नागरिक शास्त्र' को 25 अंकों की औपचारिकता से निकालकर 100 अंकों की प्राथमिकता बनाना होगा। याद रहे, एक अच्छा इंजीनियर या डॉक्टर बनने से पहले, एक अच्छा नागरिक बनना अनिवार्य है।

No comments:
Post a Comment
धन्यवाद